दिव्य गंगा सेवा मिशन कार्यक्रम में गंगा अवतरण की लीला का हुआ मंचन

उत्तर प्रदेश महाराजगंज

  • अभिनय देख ‘हर हर गंगे’की जयकारों से गूंज उठा गुरूकुल कांगड़ी परिसर
  • आस्था, उमंग और उल्लास के साथ दिखा संस्कृति के विभिन्न रंग, गंगा अवतरण की झांकियों से बच्चों ने सबका मन मोहा
  • रंगबिरंगी लाइटों से धरती पर उतरा आसमान

हरिद्वार । दिव्य गंगा सेवा मिशन हरिद्वार और गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार के तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में देश विदेश से आये गंगा पुत्रों, कवियों, समाजसेवियों ने आस्था के साथ ही विभिन्न कला संस्कृतियों का संगम बिखरते हुए गंगा की अविरलता का संकल्प लिया। इस अवसर पर गुरूकुल संकल्प सेवा परमोधर्म की अध्यक्षा रंजीता झा और संस्था सचिव तरूण कुमार शुक्ल के संयोजन में सर्वश्रेष्ठ नृत्यांगना कला केन्द्र के गुरू भवानी सिंह की देख रेख में प्रणति, निशि, अवनी, अनिका, निश्चित, नैन्सी ने सुश्री नन्दू सिंह व कोरियोग्राफर वैष्णवी झा के निर्देशन
में गंगा अवतरण व शिव झांकी प्रस्तुत कर उपस्थित दर्शको का मन मोह लिया।

गौरतलब हो कि दिव्य गंगा सेवा मिशन हरिद्वार और गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार में गंगा की अविरलता पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। जिसमें देश के तमाम ख्यातिलब्ध गंगा प्रेमियों, कवियों, साहित्यकारों तथा समाजसेवियों सहित प्रबुद्ध जनों ने प्रतिभाग किया। इस अवसर गंगा अवतरण की लीला का मंचन हुआ।

गंगा ब्रह्मलोक से स्वर्ग तक अपनी सुगंध के साथ बहने लगीं

ब्रह्मा ने विष्णु चरणोदक को गंगा नाम दिया और गंगा ब्रह्मलोक से स्वर्गलोक के बीच बहने लगीं। उसी गंगा को धरती पर लाने तथा अपने पूर्वजो को मोक्ष दिलाने के लिए भगीरथ ने तप करके गंगा को धरती पर अवतरित किया। गंगोत्री से गंगासागर तक संपूर्ण गांगेय क्षेत्र में गंगा जन्मोत्सव श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। जगत का कल्याण करने के लिए श्रीचरणों से निश्रित गंगा ब्रह्मलोक से स्वर्ग तक अपनी सुगंध के साथ बहने लगीं।

कालांतर में इसी गंगा को धरतीवासियों के उद्धार के लिए अयोध्या के राजा भगीरथ शिव की जटाओं के माध्यम से धरती पर लाए। वह दिन सवा महीने बाद गंगा दशहरे के रूप में मनाया जाता है। इक्ष्वाकु वंश की चार पीढ़ियां गंगा को धरती पर उतारने में लगीं। अंततः राजा भगीरथ इस कार्य में सफल हुए।

कपिल मुनि के आश्रम में पड़ी सगर पुत्रों की राख गंगा में बहाकर राजा भगीरथ का गंगा महायज्ञ पूर्ण हुआ।उसी गंगा में प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाते हैं और हजारों यात्री इसके तट पर दैविक और पैतृक कर्मकांड करते हैं। कृतज्ञ मानवजाति विष्णुलोक में विष्णु के चरणोदक के रूप में जन्मीं गंगा की अर्चना कर पुण्य का लाभ लेते है।

गंगा को सहस्र नामों से पुकारा जाता है। गंगा को विष्णुपदि कहा जाता है, चूंकि ब्रह्मा ने विष्णु चरणोदक को अपने कमंडल में भर लिया था अतः इसे ब्रह्म कमंडली भी कहा जाता है। हिमालय में शिव के जटाजूट से निकलकर गंगा आगे बढ़ीं तो तपस्या कर रहे ऋषि जन्हू ने उन्हें पी लिया। भगीरथ की प्रार्थना पर ऋषि ने गंगा को अपनी जंघा से छोड़ दिया और गंगा जान्ह्वी कहलाईं। गंगा ने मार्ग में ऋषि दत्तात्रेय की कुशाएं बहा दीं। उन्हें कुशोत्री भी कहा गया है।

गंगा अवतरण की लीला और शिव झांकी का मंचन संकल्प सेवा परमोधर्म ट्रस्ट की अध्यक्ष रंजीता झा व सचिव तरुण कुमार शुक्ल के संयोजन व कोरियोग्राफर वैष्णवी झा के निर्देशन में खुबसूरत नाट्य मंचन किया गया जिसमे अक्षिता बंसल, अर्चना श्रीवास्तव, श्रेया चौहान, नंदिनी जोशी, हर्षिका अरोरा, विधि चौहान, अद्या श्रीवास्तव, गरिमा चौहान ने भाग लिया।

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