हर्षोदय टाइम्स ब्यूरो महराजगंज
महराजगंज। सोहगीबरवा वन्यजीव प्रभाग के जंगलों से इस बार ऐसी खबर आई है जिसने वन विभाग के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों के चेहरे खिला दिए हैं। बाघ गणना अभियान के दौरान पहली बार शावकों के साथ बाघ परिवार की मौजूदगी के ठोस प्रमाण मिले हैं। इस खोज ने सोहगीबरवा को भविष्य के संभावित टाइगर क्षेत्र के रूप में नई पहचान दिलाने की उम्मीद जगा दी है।
वन विभाग के सर्वेक्षण में शिवपुर रेंज के जंगलों में एक नर बाघ, एक मादा बाघ और दो शावकों की गतिविधियां दर्ज की गई हैं। विशेषज्ञ इसे इस बात का संकेत मान रहे हैं कि बाघों ने अब इस इलाके को केवल गुजरने का रास्ता नहीं, बल्कि अपना स्थायी आशियाना बनाना शुरू कर दिया है। दक्षिणी खीरी क्षेत्र से लाई गई बाघिन भी यहां के प्राकृतिक माहौल में पूरी तरह घुल-मिल गई है।
नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान और बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व को जोड़ने वाला सोहगीबरवा वन क्षेत्र लंबे समय से बाघों की आवाजाही का प्रमुख गलियारा रहा है। हालांकि अब तक यहां स्थायी बाघ परिवार की मौजूदगी दर्ज नहीं की गई थी। शावकों के साथ बाघों का मिलना इस जंगल के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
वन विभाग इस बार आधुनिक तकनीक की मदद से बाघों की गणना कर रहा है। एम-एस्ट्राइप्स एप के जरिए डिजिटल फुट सर्वे, जीपीएस ट्रैकिंग और धारियों की पहचान का डेटा एकत्र कर भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून भेजा जा रहा है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की तकनीकी पुष्टि के बाद सोहगीबरवा की पहचान और मजबूत हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बाघों की स्थायी उपस्थिति को आधिकारिक मान्यता मिलती है तो सोहगीबरवा को वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के बफर जोन के रूप में विकसित करने का मार्ग प्रशस्त होगा। इससे केंद्र सरकार से अतिरिक्त संसाधन, सुरक्षा व्यवस्था और पर्यटन विकास के लिए विशेष सहायता मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।
वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि जंगल ने बाघों को अपना लिया है, अब जिम्मेदारी शासन और वन विभाग की है कि वे इस विरासत को सुरक्षित रखें। यदि संरक्षण के प्रयास मजबूत रहे तो आने वाले वर्षों में सोहगीबरवा की पहचान बाघों की दहाड़ से गूंजते जंगल के रूप में हो सकती है।

