बाराबंकी। देवा शरीफ स्थित सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की दरगाह पर इस वर्ष भी सौहार्द और गंगा-जमुनी तहज़ीब की अनूठी मिसाल देखने को मिली। करीब 100 साल पुरानी परंपरा को निभाते हुए हिंदू और मुस्लिम युवकों ने मिलकर मजार पर होली खेली और एक-दूसरे को गुलाल लगाकर भाईचारे का संदेश दिया।
होली के अवसर पर सुबह से ही दरगाह परिसर में श्रद्धालुओं और युवाओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। “होली है” के जयघोष के बीच लोगों ने एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर खुशियां साझा कीं। रंगों से सराबोर माहौल में सभी समुदायों के लोग एक साथ नजर आए।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह परंपरा पिछले लगभग एक सदी से चली आ रही है। हर वर्ष होली के मौके पर दरगाह पर विशेष आयोजन होता है, जिसमें क्षेत्र के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। इस बार खास बात यह रही कि नई पीढ़ी ने आगे आकर आयोजन की जिम्मेदारी संभाली और पूरे उत्साह के साथ कार्यक्रम को सफल बनाया।
कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा व्यवस्था भी चाक-चौबंद रही। प्रशासन की निगरानी में आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। देवा शरीफ की यह परंपरा एक बार फिर यह संदेश दे गई कि आपसी प्रेम और सौहार्द ही समाज की असली ताकत है।


