नागपंचमी पर रुदलापुर में ‘महिषासुर’ की सवारी का दावा, आस्था या अंधविश्वास?

उत्तर प्रदेश महाराजगंज



महराजगंज। जिले के रुदलापुर गांव में नागपंचमी के दिन हर तीन साल में सामने आने वाला एक कथित धार्मिक घटनाक्रम लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीणों का दावा है कि गांव के करीब 70 वर्षीय बुद्धिराम के शरीर में इस दिन ‘महिषासुर’ का प्रवेश होता है। इसके बाद वह सामान्य व्यवहार से अलग होकर जानवरों के चारे के रूप में रखे भूसे और घास का सेवन करने लगते हैं। इस कथित घटना को देखने के लिए आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।


ग्रामीणों के अनुसार बुद्धिराम वर्ष 1975 से इस परंपरा का हिस्सा रहे हैं। नागपंचमी के दिन गांव स्थित समय माता मंदिर में पूजा-पाठ के बाद यह घटनाक्रम शुरू होने की बात कही जाती है। इसके बाद बुद्धिराम कथित तौर पर नाद में रखे पानी के साथ भूसा और घास खाने लगते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि कई बार वह चार हौदियों में रखा भूसा तक खा जाते हैं।
घटना के दौरान कुछ लोग उन्हें अपने हाथों से केला, घास, भूसा और लड्डू खिलाते भी नजर आते हैं। ग्रामीणों में ऐसी मान्यता है कि यहां मांगी गई मनौतियां पूरी होती हैं। इसी आस्था के चलते नागपंचमी पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु रुदलापुर पहुंचते हैं और इस पूरे घटनाक्रम को अपनी आंखों से देखते हैं।


हालांकि, ‘महिषासुर’ के किसी व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करने या उसके बाद इस तरह के व्यवहार के संबंध में कोई वैज्ञानिक पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस घटना के पीछे धार्मिक आस्था है, अंधविश्वास है या फिर कोई चिकित्सकीय अथवा व्यवहार संबंधी कारण।


विशेषज्ञों के अनुसार, किसी व्यक्ति के असामान्य व्यवहार को केवल धार्मिक या आध्यात्मिक कारणों से जोड़ने से पहले उसके चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक पहलुओं की भी जांच जरूरी है। हालांकि, रुदलापुर की इस घटना के संबंध में किसी विशेषज्ञ की जांच या चिकित्सकीय निष्कर्ष सामने नहीं आया है, इसलिए इसके कारण को लेकर निश्चित दावा करना उचित नहीं होगा।


आस्था और विज्ञान के बीच सवाल


रुदलापुर में नागपंचमी पर होने वाला यह घटनाक्रम वर्षों से ग्रामीणों की आस्था का हिस्सा बना हुआ है। ग्रामीण इसे धार्मिक मान्यता और ‘महिषासुर’ की सवारी से जोड़कर देखते हैं, जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसकी प्रमाणिकता और कारणों की जांच आवश्यक है। फिलहाल यह घटना आस्था और वैज्ञानिक जांच के बीच कई सवाल खड़े करती है।

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